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असहजता या असफलता

असफलता यर असहजता चाहे आप कुछ भी कह लीजिए यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाते हैं जब निर्णायक सिक्का किस्मत या भविष्य के खेल में उछलता है।
चाहे इसे भारतीय मानसिकता कह लीजिये या फिर अभिशाप मध्यवर्गीय का परंतु सच यही है कि काबिलियत दरकिनार कर दी जाती है जब आप असफलता की गली का रुख करते हैं।

दृश्य  कुछ ऐसा होता है कि गली बेहद तंग हो और आप वँहा अब गुज़र रहे हुम तंग गलियारें के चारों ओर ऊंची ऊंची इमारतें हों जिसकी बालकनी पर मानो हाथ में कालिख व चबूख लिए मानो अपने ही आपको मारने के लिए अमादा हों। यह मंजर बड़ा भयावह होता है जनाब। जब गली का दरवाजा खुलता है तो समय की टिकटिकाहट मानो असहजता की सारी बेड़ियों को तोड़ती आपको आपगे बढ़ने पर विवश करे। गली मानो उस फांसी के फंदे की तरह लग रही हो जो आपका बेसब्री से इंतजार कर रहा हो। जैसे ही गली में आगे की ओर बढ़ा जाता है सहसा कोई हाथो में कालिख लिए आपको रँगने को तैयार हो कोई चबूख ले आपके शरीर को छल्ली छल्ली करने को खड़ा हो और कोई जब आपके अपने हो तो  दृश्य भयावह हो जाता है।

आखिर असफलता व सफलता के बीच इतना विभेद क्यों? व्यवहार की प्रकृति में फेरबदल क्यों मानो आप एक बलात्कारी हों व अपनो को आपको अपना कहने पर शर्म महसूस  होती हो। बलात्कारी और असफल व्यक्ति को इतनी समानता से भला क्यों देखा जाए। यही असफल व्यक्ति की तुलना असमानता से की जाए तो कदापि गलत ना हो।

यदि एक नज़र समाज के उस तबके पर डाली जाए जो इन भावना का कारण बनते हैं


 तो एक बार अवश्य उन्हें कटघरे में खड़ा करना चाहिए और पूछा जाना चाहिए कि क्या कभी आप असफल नहीं हुए हैं?
यदि बात की जाए तो असफलता असफलता है चाहै वह किसी की भी हो या कैसी भी परन्तु असफलता को मात्र उस समय हीनता की भावना से देखा जाता है जब वह शैक्षणिक व प्रतिस्प्रधात्मक हो।
यही गौर किया जाए तो असफलता तक के साथ भेदभाव किया जाता है । उदाहरण के तौर पर यही असफलता शैक्षणिक व प्रतिस्पर्धा से सम्बन्धित हो तो वह हीन है परंतु  यदी किसी और से सम्बंधित हो तो वह अपना उच्च स्थान बनाए रखती है।
इस भाव को एक अन्य उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है।मान लीजिए कि एक हस्पताल में एक डॉक्टर रोगी का ऑपरेशन कर रहा है और वह असफल हो जाता है व रोगी की मृत्यु हो जाती है तो यहां भी असफलता हुई बल्कि घाटा प्राणों का हुआ तो भी इस असफलता को घृणित नहीं देखा जाएगा बल्कि दूसरी ओर एक छात्र असफल हो जाए तो क्या उसे स्वीकार किया जाएगा? कदापि नहीं। आखिर क्यों असफलता की जीवन से ज्यादा अहमियत दी गयी हैं?
जो असफल हुआ वह दोषी तो नही तो भला क्यों उससे ऐसा वर्ताव ?
क्यों समाज द्वाारा यह नहीं समझा जााता  की हारेगा वही जो प्रेरयास करेग, दौड़ेगा।
लाख दर्शकों के बीच तालियां बजाने से अच्छा है तू भाग बेशक असफल हो।क्या हुआ यही हार जाओगे? सूर्य भी तो रोज़ असफल होताहै, अस्त होता है। जब प्रकृति तक असफल है तो भेद खाली तुमसे क्यों?
आवश्यकता है समाज को बदलने की। यदि असफलता का दोष यूँही बढ़ता गया तो न कभी कोई प्रयास करेगा न कोई जीतेगा।
हमें यह समझना चाहिए कि असफल होने वाला कोई अपराधी नहीं बल्कि एक मानुस है जिसने प्रयास किया है। यही असफल को दोषी कहा जाए तो क्यों है वो दोषी क्या दोष किया है? कौन सी दंड संहिता में उसे दोषी और सजा का प्रावधान है? 1 कोई ऐसा उदाहरण दो जो असफलता की सीढ़ी न चढ़ा हो? क्यों मात्र  मंदिर भगवान के बने, इंसान के क्यों नही?
आवश्यकता है तुम्हें बदलने की अपनी आंख से पर्दा उठाने की, देखने की कि तुम खो क्या रहे हो। असफल तुम हो प्रयास करने वाला नहीं। वह असफल हो सफल होगा, बेहतर होगा, प्रगति करेगा उसको दोष दे तुम रुकोगे। रास्ता तुम्हारा बन्द होगा उसका नही।

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